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(अतुल शर्मा)

रिश्‍ते जो कभी होते हैं अपने से
और बेगाने से कभी
रिश्‍ते जो होते हैं दिल के करीब
और हजारों मील दूर होते हैं कभी
रिश्‍ते जो कभी हंसाते हैं
और रुलाते भी कभी
रिश्‍ते जो कभी होते हैं मीठे से
और हो जाते हैं कडवे कभी
रिश्‍ते जो कभी गुदगुदाते हैं
और देते हैं अकुलाहट कभी
रिश्‍ते जो होते हैं सहज अभी
और देने लगते हैं झुंझलाहट कभी
रिश्‍ते जो मस्‍तक गर्वित करते हैं
और शर्म से गर्दन झुकाते हैं कभी
रिश्‍ते जो कभी त्‍याग मांगते हैं
और जीवन भी कभी
रिश्‍ते जो कभी
अंगुली पकडकर चलाना सिखाते हैं
क्‍यों आ जाते हैं कांधे पर कभी ?

(‘पतझड सावन वंसत बहार’ संकलन में प्रकाशित कविता)