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(अतुल शर्मा)


जब हो हर तरफ तन्हाई
रात हो घिर आई
धीरे से तुम सिसकना मत
चाँद से कुछ बातें करना
मुस्कराना
इठलाना
गुदगुदाना
और फिर प्यार से
ग़मों को अपने भूल जाना
देखोगे कि सुबह फैली हुई है
अपनी सौगात लेकर
रात की कालिमा को धोकर
जीवन निराशा की नहीं सुख की भाषा है
इस से भागना नहीं
अपने आगोश में पकड़ लेना
प्यार बांटना गम नहीं
मुस्कुराते रहना
सिसकना रोना नहीं.
(‘पतझड सावन वंसत बहार’ संकलन में प्रकाशित कविता)







(अतुल शर्मा)

रिश्‍ते जो कभी होते हैं अपने से
और बेगाने से कभी
रिश्‍ते जो होते हैं दिल के करीब
और हजारों मील दूर होते हैं कभी
रिश्‍ते जो कभी हंसाते हैं
और रुलाते भी कभी
रिश्‍ते जो कभी होते हैं मीठे से
और हो जाते हैं कडवे कभी
रिश्‍ते जो कभी गुदगुदाते हैं
और देते हैं अकुलाहट कभी
रिश्‍ते जो होते हैं सहज अभी
और देने लगते हैं झुंझलाहट कभी
रिश्‍ते जो मस्‍तक गर्वित करते हैं
और शर्म से गर्दन झुकाते हैं कभी
रिश्‍ते जो कभी त्‍याग मांगते हैं
और जीवन भी कभी
रिश्‍ते जो कभी
अंगुली पकडकर चलाना सिखाते हैं
क्‍यों आ जाते हैं कांधे पर कभी ?

(‘पतझड सावन वंसत बहार’ संकलन में प्रकाशित कविता)





(अतुल शर्मा)

जब दिल में दर्द हो
आंखों में आंसू की बूंदें हों
भीड में भी अकेलापन हो
आसपास कोई चाहने वाला न हो
जब अपने शब्‍द ही
लौट कर वापस आते हों
ख्‍यालों में भी तनहाइयॉं हों
न कुछ करने को हो
और गर कुछ करना चाहो भी
तो उठने की हिम्‍मत न हो
चुपचाप दो आसूं बहा लेना मेरे दोस्‍त
हो सकता है तुम्‍हारे जनाजे पर
कोई रोने वाला भी न हो ।
........ अतुल शर्मा