(अतुल शर्मा)
क्या तुमने देखी हैं कभी
अधनंगे बदन पर
समय की झुर्रियां
या कभी महसूस किया है
उन तपते बदनों पर
सूरज की आग को
जिन हाथों में कभी हथौड़े
और कभी फावड़े होते हैं
जिनके घर कभी टाट के
और कभी सिर्फ़ आस के होते हैं
धूप में जो जला देते हैं
अपनी सारी जवानी
और ठंडी रातों में
खांसते हुए गुज़ारते हैं
अपना बुढापा
या तुमने भी देखा है उन्हें
मेरी तरह ही उचाट निगाहों से
और पास से गुज़रते हुए
तुमने भी फेर लिया है
मुंह दूसरी ओर।
अतुल शर्मा
क्या तुमने देखी हैं कभी
अधनंगे बदन पर
समय की झुर्रियां
या कभी महसूस किया है
उन तपते बदनों पर
सूरज की आग को
जिन हाथों में कभी हथौड़े
और कभी फावड़े होते हैं
जिनके घर कभी टाट के
और कभी सिर्फ़ आस के होते हैं
धूप में जो जला देते हैं
अपनी सारी जवानी
और ठंडी रातों में
खांसते हुए गुज़ारते हैं
अपना बुढापा
या तुमने भी देखा है उन्हें
मेरी तरह ही उचाट निगाहों से
और पास से गुज़रते हुए
तुमने भी फेर लिया है
मुंह दूसरी ओर।
अतुल शर्मा