Showing posts with label पतझड़ सावन वसंत बहार. Show all posts
Showing posts with label पतझड़ सावन वसंत बहार. Show all posts
(अतुल शर्मा)


जब हो हर तरफ तन्हाई
रात हो घिर आई
धीरे से तुम सिसकना मत
चाँद से कुछ बातें करना
मुस्कराना
इठलाना
गुदगुदाना
और फिर प्यार से
ग़मों को अपने भूल जाना
देखोगे कि सुबह फैली हुई है
अपनी सौगात लेकर
रात की कालिमा को धोकर
जीवन निराशा की नहीं सुख की भाषा है
इस से भागना नहीं
अपने आगोश में पकड़ लेना
प्यार बांटना गम नहीं
मुस्कुराते रहना
सिसकना रोना नहीं.
(‘पतझड सावन वंसत बहार’ संकलन में प्रकाशित कविता)







(अतुल शर्मा)

क्या तुमने देखी हैं कभी
अधनंगे बदन पर
समय की झुर्रियां
या कभी महसूस किया है
उन तपते बदनों पर
सूरज की आग को
जिन हाथों में कभी हथौड़े
और कभी फावड़े होते हैं
जिनके घर कभी टाट के
और कभी सिर्फ़ आस के होते हैं
धूप में जो जला देते हैं
अपनी सारी जवानी
और ठंडी रातों में
खांसते हुए गुज़ारते हैं
अपना बुढापा
या तुमने भी देखा है उन्हें
मेरी तरह ही उचाट निगाहों से
और पास से गुज़रते हुए
तुमने भी फेर लिया है
मुंह दूसरी ओर।
अतुल शर्मा