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(अतुल शर्मा)


जब हो हर तरफ तन्हाई
रात हो घिर आई
धीरे से तुम सिसकना मत
चाँद से कुछ बातें करना
मुस्कराना
इठलाना
गुदगुदाना
और फिर प्यार से
ग़मों को अपने भूल जाना
देखोगे कि सुबह फैली हुई है
अपनी सौगात लेकर
रात की कालिमा को धोकर
जीवन निराशा की नहीं सुख की भाषा है
इस से भागना नहीं
अपने आगोश में पकड़ लेना
प्यार बांटना गम नहीं
मुस्कुराते रहना
सिसकना रोना नहीं.
(‘पतझड सावन वंसत बहार’ संकलन में प्रकाशित कविता)







(अतुल शर्मा)

नभ से गिरती बारिश की कोई बूँद
जब धीरे से तुम्‍हें स्‍पर्श कर ले
या ओस की पहली किरण
जब तुम्‍हें ‍हल्के से चूम ले
ठंडी हवा का मस्‍त सा झोंका
तुम्‍हें प्‍यार से सहला दे
चांदनी की हलकी सी रुमानियत
तुम्‍हें धीरे से छू जाए
भीगी माटी की सौंधी सी खुश्‍बू
तुम्‍हें प्‍यार से सराबोर कर दे
तब
तुम एक बार मुझे याद करना
मेरे प्‍यार की गर्माहट को महसूस करना
तपती धूप में रिमझिम फुहारों सा मेरा प्‍यार
सर्द जाडों की रातों में सुलगती आग सा मेरा प्‍यार
दूर तक फैले रेगिस्‍तान में हो जैसे
छोटा सा नखलिस्‍तान मेरा प्‍यार
कांटों के बीच सुर्ख गुलाब सा प्‍यार
बरसते बादलों में इद्रधनुष सा मेरा प्‍यार
स्‍वार्थ की दुनिया के बीच यह मासूम प्‍यार
दो दिलों को जोडता यह कैसा खुमार
सुहाने सफर की नींद सा यह प्‍यार
सुबह की उनींदी बोझिल आंखों का प्‍यार
हिमगिरी से उतरती गंगा सा प्‍यार
पहाड से गिरते झरनों सा प्‍यार
पक्षि‍‍यों के कलरव सा गूंजता यह प्‍यार
दुनिया से अहसासों में सबसे खूबसूरत यह प्‍यार
इन सब अहसासों में तुम मुझे याद करना
और फिर मुझसे सिर्फ मुझसे प्‍यार करना।

अतुल शर्मा



(अतुल शर्मा)

कभी जो हमारा सहारा थे
आज बेसहारा हैं
और इस अहसास को
मैंने महसूस किया हे
ठीक तुम्हारी ही तरह
कभी जो हमारा सहारा थे
आज बेसहारा हैं
और हम बेबस है
ठीक तुम्हारी ही तरह
जिन हाथों ने थामी थी
कभी छोटी सी अंगुलियां
कराहा था जिनका दिल कभी
नन्हीं आंखों में आंसू आ जाने से
उनको अकेला छोड दिया है
बेरहम हालातों से लड़ने के लिए
बूढ़ी, बेबस और पथराई आंखे
तकती रहीं सहारे के लिए
और हम चले आए वहां से
ठीक तुम्हारी ही तरह।
अतुल शर्मा



(अतुल शर्मा)

क्या तुमने देखी हैं कभी
अधनंगे बदन पर
समय की झुर्रियां
या कभी महसूस किया है
उन तपते बदनों पर
सूरज की आग को
जिन हाथों में कभी हथौड़े
और कभी फावड़े होते हैं
जिनके घर कभी टाट के
और कभी सिर्फ़ आस के होते हैं
धूप में जो जला देते हैं
अपनी सारी जवानी
और ठंडी रातों में
खांसते हुए गुज़ारते हैं
अपना बुढापा
या तुमने भी देखा है उन्हें
मेरी तरह ही उचाट निगाहों से
और पास से गुज़रते हुए
तुमने भी फेर लिया है
मुंह दूसरी ओर।
अतुल शर्मा